बस इक आख़िरी इल्तिजा है तुमसे,
जो न दे सका अब तक वो ले जाना,
उस ख़ून के क़तरे हैं उस रूमाल में,
जो आँखों से टपका था, आँसू बन के ।
बस वहीं सिराहने पे रक्खा है,
ज़रा प्यार से पत्थर हटाना ।
जो न दे सका अब तक वो ले जाना,
उस ख़ून के क़तरे हैं उस रूमाल में,
जो आँखों से टपका था, आँसू बन के ।
बस वहीं सिराहने पे रक्खा है,
ज़रा प्यार से पत्थर हटाना ।
No comments:
Post a Comment