Wednesday, September 4, 2013

मेरा प्रिय शिक्षक


गाय के बाद अपने ऊपर निबन्ध लिखवाने के क्षेत्र में 'मेरा प्रिय शिक्षक' और 'मेरा प्रिय मित्र' अग्रगण्य हैं। दोनों ही हर कक्षा में, हर परीक्षा में अपने ऊपर निबन्ध लिखवाते नजर आते हैं।  तिमाही नहीं तो छमाही, नहीं तो सालाना, कभी न कभी तो आपको इन पर स्याही खर्चना ही पड़ेगा। गाय यदि निबंधों  के क्षेत्र का सर्वव्यापी, सर्वगोचर ईश्वर है, तो 'मेरा प्रिय शिक्षक' और 'मेरा प्रिय मित्र' कोई हाई स्टेटस इंद्र-विन्द्र टाइप देवता से कोई कम नहीं। दोनों का मुकाबला काफ़ी तगड़ा प्रतीत होता है, पर एक जगह जाकर 'मेरा प्रिय मित्र' कुछ ठिठक सा जाता है --
मेरे पास 'शिक्षक-दिवस' है, तुम्हारे पास क्या है?
मेरे पास 'फ्रैंडशिप डे' है
वो इंग्लिश के घंटे में, हिंदी के पीरियड में तुम्हारे पास क्या है? व्हाट हैव यू?
मेरा प्रिय मित्र चुपके से अपनी होम-मेड चीज़ सैंडविच खाने लगता है, मेरा प्रिय शिक्षक 'वाटरसाइड इन' में अपना कार्ड टैब पर लगा देता है।
अब चूंकि जीत शिक्षक की हो गयी है, फिर हमारा निबन्ध भी शिक्षक पर ही बनता है। (प्रिय उसमे से जान-बूझ कर हटाया गया है। अब इतना हमसे न हो पायेगा, शिक्षक पर निबन्ध भी लिख दें और उसको प्रिय भी कह  दें)
अब जब बात शिक्षक पर निबन्ध की चल ही गयी है, तो इस क्षेत्र में मेरे प्रिय पिताजी का योगदान भी उल्लेखनीय है। वैसे तो 'मेरे प्रिय पिताजी' स्वयं एक निबंधनीय विषय हैं, पर चिंता न कीजिये जब कह दिए हैं की शिक्षक पर लिखेंगे तो शिक्षक पर ही लिखेंगे। आदतानुसार थोडा-बहुत  भटकेंगे विषय से, लेकिन वो मात्र आपके मनोरंजन के लिये. उसे शिक्षक-गण अपना नितादर कतई न समझें। हाँ तो पिताजी का उल्लेखनीय योगदान आया सन् 1970 ईसवी में शिक्षक-दिवस पर, जब उन्हें सीतापुर जिले के कालेजों के लिए आयोजित लाला जोकू लाल स्मारक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में अपनी कविता 'तुम कहते हो खुद को टीचर, पर तुम हो निरे फटीचर' के लिए तृतीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। हालाँकि मिल उन्हें पहला भी सकता था यदि आयोजक, 'न्यूनतम प्रतिभागियों की संख्या तीन होगी' इस शर्त के साथ समझौता करने को राजी होते।
शिक्षक एक बड़ा ही निरीह प्राणी है। और यदि वह शादीशुदा हो तो उसकी निरीहता, बदकिस्मती या पूर्व-जन्म के पाप भी कहला सकती है। ये गिरती हुई अर्थव्यवस्था और फिसलता हुआ रुपया यदि किसी चीज़ को देख कर गम खा लेते हैं तो वह शिक्षक की दशा ही है। कुछ विद्वानों का मत है की ईश्वर ने शिक्षक की रचना ही इसलिए की कि मनुष्य जाति पर अंकुश रखा जा सके। 'भय बिनु होइ न प्रीति' वाले दोहे में भय का 'भ' और 'य' दोनों ही शिक्षक की ही देन  हैं। मुझे तो लगता है कि एक शिक्षक के जीवन में बस खुशी का अवसर तभी आता है जब वह 13, 17 या 19 का पहाड़ा सुनता है या 'बोतल हिली और हिल-हिला  कर रह गयी' का ट्रांसलेशन। यदि वह छात्र जिससे उसे बिलकुल उम्मीद न हो, 19 का पहाडा सुना दे तो शिक्षक की भुजाएं फड़कने लगती हैं और उसके हाथ की 'अरहर की संटी' रक्त-पिपासु हो उठती है। अब उस छात्र से तब तक सवालात किये जाते हैं, जब तक फफक कर रो न पड़े। 'गुरु जी, मारो मारो मुझे और मारो'
शिक्षक पर लिखा हुआ कोई भी निबन्ध बिना पंडित सीता नारायण पांडे (एम . ए - इंग्लिश ) के जिक्र के उपसन्हरित नहीं हो सकता।
पण्डे जी बड़े मशहूर थे इंग्लिश का 'डफ' पेपर बनाने के लिए। वे सीनियर टीचर थे, हाई स्कूल, इंटर के नीचे बात करना भी उनकी शान के खिलाफ था। उनकी मानें तो फ़िराक गोरखपुरी से जरूर कोई चूक हुई थी, असल में हिंदुस्तान में इंग्लिश पौने तीन लोगों को आती थी और उसमे चार आना इनका भी था। खैर गिरती हुई अर्थव्यवस्था, कॉस्ट-कटिंग, और मंदी की चपेट से जब इंग्लैण्ड स्वयं नहीं बच पाया तो पांडे जी ने भी मन मसोस कर कक्षा छ: को पढ़ाना स्वीकार कर लिया। गाज गिरी सिक्स्थ-ए पर, वो भी शिक्षक दिवस के दिन। सबसे पहले हिंदी में वार्तालाप निषिद्ध हुआ, फिर अगले एक महीने तक हमने जाना कि इस देश का सर्वनाश निश्चित है क्योंकि देश उनसे कक्षा छ: को पढ़वा रहा है। फिर जब मुझे यह लगने लगा की यह जिच नहीं टूटेगी, तो एक दिन मैंने हिम्मत कर के बताया कि यह माध्यमिक शिक्षा बोर्ड है और यहाँ कक्षा छ: में इंग्लिश पहली बार पढाई जाती है। कृपया हमे एबीसीडी लिखना सिखाएं। मुआमला आगे बढ़ा, हम लेटर से वर्ड, वर्ड से सेंटेंस की ओर बढ़ने लगे और फिर आये सवाल-जवाब। पांडे जी सारे सवाल जवाब कापी पर लिखवाते थे. और बाहरफ़ उसे इम्तिहान में वैसे ही चाहते थे।
Q: Who is Sita?
A: Sita is Ramesh's daughter.

Q: What is she doing?
A: She is dancing.          
          
सालाना इम्तिहान में, गुरूजी ने बड़ा 'डफ' पेपर बनाया। दस-पंद्रह सवालों के बीच में एक सवाल था --
Q: What is she doing?

मैंने पूछा गुरूजी ये she कौन है?
कहा था न बहुत 'डफ' पेपर बनेगा, सही से पढ़ना ...

जय शिक्षक दिवस, जय महाराष्ट। 
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