Friday, November 24, 2006

पानी

सहेज कर रखे थे जो कुछ एक पन्ने, दूर बहा ले गया ये ज़ोर सा पानी.
समेटा था जिसे युग- युग से टहल कर , चुरा ले गया, ये चोर था पानी .
बार- बार उठा कुछ बोलना चाहा, मुह बंद कर गया मुह- ज़ोर था पानी.
याद दिलाता रहा हज़ार बार- बार, भूल गया सब कुछ कमज़ोर था पानी.
घबरा के फेरी मैने नज़रें इधर उधर, भर गया आँखों में ज़ार- ज़ार पानी.
सोचा मैने भर लूं बटोर के बर्तन मे, माँग बैठे तब सब उधार- उधार पानी.
सुप्रेम त्रिवेदी "विद्रोही "
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