Saturday, December 25, 2010

बीमार इस लाइलाज के फ़क़त एक हम नहीं.

निशानात पांवों के दो दर्ज हैं,
सहरा में अकेले हम ही हम नहीं.

हवाएं औसत से ज्याद गर्म हैं,
ये आहें हमारी अकेले नहीं.

बात तुम खूब कहते थे, कहते हो, कहते रहोगे,
चुप रहना यूँ हमारी भी फितरत नहीं.

न ओढ़न, न बालों, न पैरहन का सलीका,
सामाँ हमारे भी बिखरे कम नहीं.

ये छुप के रो लिए, वो मुंह धो के सो सो लिए,
पलकें हमारी भी कुछ कम नम नहीं.

हकीकत में ही जिला सकता तो तसवीरें बनाता क्यों खुदा,
खरीदार ख्वाबों के भी कुछ कम नहीं.

नज़्म लिखते हम हैं, पढ़ते तुम हो, बिकने दूर तक जाती हैं,
बीमार इस लाइलाज के फ़क़त एक हम नहीं.
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