Sunday, August 25, 2013

हे कृष्ण

हे कृष्ण,
यदि तुम ढाई सौ रुपये के न होते तो मैं तुम्हे खरीद लेता,
और खरीद कर
तुम्हे अन्दर वाले कमरे की तीसरी अलमारी के सबसे ऊपर वाले खाने में सजाता,
वो खाना जहाँ सीधी धूप आती है,
तुम धूप खाते,
आराम से रहते,
पर तुम, तुम तो ढाई सौ रुपये के हो,
वो मूर्ति वाला क्या करे,
उसके भी तो सात लड़कियां है
वो भी तो तुम्हे सस्ता बेच नहीं सकता,
हे कृष्ण ! उसकी लड़कियां ज्यादा हैं
और मेरे पैसे  कम
उसकी लड़कियां कम रखता, और मेरे पैसे ज्यादा
तो मस्त धूप खाता
पड़ा रह गोदाम में
इंतज़ार में ढाई सौ रुपये के
पड़ा रह


----- this poem is a hearsay recreation of a poem by Mr Vijay Mishra. Words might be mine but the central idea is totally borrowed from his poem.
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