Monday, May 24, 2010

मेरे घर की टूटी खिड़की से

मेरे घर की टूटी खिड़की से, कुछ-कुछ धूप भी आती है कुछ-कुछ छाँव भी आती है.
अब तक वो शहरों में गुम थी, घने चार पहरों में गुम थी,
वो उजली सी, वो बिजली सी, सीमित वन में नहीं कदाचित,
मेरे गाँव भी आती है.
मेरे घर की टूटी खिड़की से, कुछ-कुछ धूप भी आती है कुछ-कुछ छाँव भी आती है.

हो मंगल का मेला, या जुमेरात की रात कव्वाली,
सीपी-शंख की मेलें छन-छन, झांझर-झुमके, बुर्के वाली.
क्रंदन कोलाहल बच्चों का, समझ सयानी शर्म की लाली.
चपल भागती कभी सरापट, झिझकी कभी, कभी कदाचित,
दबे पाँव भी आती है,
मेरे घर की टूटी खिड़की से, कुछ-कुछ धूप भी आती है कुछ-कुछ छाँव भी आती है.

गिरजाघर के घंटे टन-टन, जगराते की रात का मजमा,
भजन कीर्तन ढपली ढोलक, साखी सबद रमैनी अबतक,
कभी जगद-आरती जगदम्बा की, कभी अफ्तारी का घोष कदाचित, कभी
भोर अज़ान भी आती है.
मेरे घर की टूटी खिड़की से, कुछ-कुछ धूप भी आती है कुछ-कुछ छाँव भी आती है.
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