Sunday, August 25, 2013

हे कृष्ण

हे कृष्ण,
यदि तुम ढाई सौ रुपये के न होते तो मैं तुम्हे खरीद लेता,
और खरीद कर
तुम्हे अन्दर वाले कमरे की तीसरी अलमारी के सबसे ऊपर वाले खाने में सजाता,
वो खाना जहाँ सीधी धूप आती है,
तुम धूप खाते,
आराम से रहते,
पर तुम, तुम तो ढाई सौ रुपये के हो,
वो मूर्ति वाला क्या करे,
उसके भी तो सात लड़कियां है
वो भी तो तुम्हे सस्ता बेच नहीं सकता,
हे कृष्ण ! उसकी लड़कियां ज्यादा हैं
और मेरे पैसे  कम
उसकी लड़कियां कम रखता, और मेरे पैसे ज्यादा
तो मस्त धूप खाता
पड़ा रह गोदाम में
इंतज़ार में ढाई सौ रुपये के
पड़ा रह


----- this poem is a hearsay recreation of a poem by Mr Vijay Mishra. Words might be mine but the central idea is totally borrowed from his poem.

Sunday, February 3, 2013

तुम प्रेम सी नौका मिली, मैं पार जीवन तट गया

तम रात थी, कुछ कट गयी
सुध भोर थी आकर गयी,
ये दिन बड़ा लाचार था,
कुछ राग था कुछ प्यार था,
तुम पास थे सब साथ था,
तुम दूर थे, एहसास था,
फिर सूर्य की पहली किरण,
घन मेघ सारा छट गया,
तुम प्रेम सी नौका मिली,
मैं पार जीवन तट गया

धूप ने व्याकुल किया,
इक हाथ ने संबल दिया,
नयन भीगे, रूप व्यापक,
आर्द्र मौसम, देखो जहाँ तक
फिर जोर की बारिश हुई,
सब क्षोभ ढिल कर घुल गया,
तुम प्रेम सी नौका मिली,
मैं पार जीवन तट गया






Sunday, November 27, 2011

गद्दे-चादर हाथ में ले लो, बने कफ़न ये साथ चलेंगे

आंसू अब न और बहेंगे, अब लब ना खामोश रहेंगे,
रस्ते अपनी राह बदलकर, अपनी मंजिल आप चलेंगे.

कलम-दवातें फूट पड़ेंगी, घर-घर बैरक बाक बनेंगे,
कागज़ पत्तर ढाल बनें तो, कलम से खंजर काट बनेंगे.

मर मर कर कितना थे जिन्दा, अब मरने के बाद जियेंगे.
गद्दे-चादर हाथ में ले लो, बने कफ़न ये साथ चलेंगे.

Tuesday, October 18, 2011

समेट तो हम अपने सिफर न सके.

मंजिलों पर पहुँचने का दम था मगर,
राह खोने के ग़म से उबर न सके,
आसमाँ में उड़ने का दम था मगर,
 हम ज़मीं पर ही अपनी ठहर न सके,
शमशानों में जीने का दम था मगर,
हो के अपने तो रह ये शहर न सके,
रात को चीर सकने का दम था मगर,
 खोज तो हम अपनी सहर न सके,
हजारों-लाखों को गिनने का दम था मगर,
समेट तो हम अपने सिफर न सके.

Wednesday, September 14, 2011

खबरों का इंतज़ार था, वो अब तक नहीं आयी

वाकिये तो यूँ शब भर होते किये तमाम,
खबरों का इंतज़ार था, वो अब तक नहीं आयी.

मसूद थे पर इस बात का इम्काँ  चलो टूटा,
इस बार वो बारिश हुई, घर तक चली आयी.

जुगनुओं की तलाश में भटका किये दिन भर,
आफताब की पहली किरन फिर दिन ढले आयी.

किताबें पढ़ने वालों से ख़ासी, नाखुश थी ज़िन्दगी,
फटे सफ़े के सवालों को वो पहलो पहल लाई.

मस्जिद की सब ईंटें चुकती गयीं वली,
मेरे आंगन में ये दीवार, बढ़ती चली आयी.


-- विद्रोही भिक्षुक

Friday, March 18, 2011

चार लाइन

सिर्फ चार लाइन हैं ...

चिराग़, मुझे नहीं पता क्या तेरी ख़ता है, 
पर जो भी रौशनी करता है उसे जला देते हैं ये लोग.

फकीर, तू किस तलाश में इस शहर में निकला है,
छत पे बैठे परिंदे भी उड़ा देते हैं ये लोग.

-- विद्रोही भिक्षुक

Tuesday, January 11, 2011

आधुनिक मुहावरे एवं लोकोक्तियाँ


स्कूल के दौरान इससे मज़ेदार और स्रजनात्मक लेखन प्रश्नोत्तरों के दौरान शायद ही किसी ने किसी ने किये हों. हमारी (इसे कुछ लोग मेरी भी कहते हैं, लेकिन हम लखनऊवासी 'मैं' को 'मैं' नहीं 'हम' कहते हैं क्योंकि हम कभी अकेले नहीं चलते, जहाँ चलते हैं चार लड़के दायें बाएँ हमेशा रहते हैं.) हिंदी की अध्यापिका महोदया हमेशा हमसे इसीलिए परेशान रहीं. कभी हम इस प्रश्न का उत्तर खाली छोड़ के नहीं आये. एक वाक्य बोलिन तौ दुई लिखेन की एक तौ सही हुइबे करिहै. एक बार तो उन्होंने हद्द ही कर दी. प्रश्न में सिर्फ वाक्य प्रयोग करने को बोला अर्थ लिखने को नहीं. हम बड़े खुश ... पढ़ लो ये रायता फैलाये थे हम.

सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाना:  मेरी सिट्टी-पिट्टी बहुत दिनों से गुम है, मिलती ही नहीं.
असमान फट पड़ना:         मेरा असमान बहुत दिनों से फटा पड़ा है. कृपया उसे जोड़ दें.

अब इस पर नंबर तो मिले नहीं. हाँ लेकिन सबके सामने बुला के वाह-वाही खूब मिली, और क्लास से तीन दिन की छुट्टी भी. खैर अब इतिहास के पन्नों से दूर निकल कर आज के वास्तविक मुद्दे पर आते हैं. आज का टॉपिक है - आधुनिक मुहावरे एवं लोकोक्तियाँ
वैसे इस टॉपिक पर अधिक प्रकाश डालने से पहले ये ज़रूरी है की मैं आप लोगों को मुहावरों और लोकोक्तियों (कहावतों) में अंतर बता दूं. (मुझे पूर्ण विश्वास है की जब इस प्रश्न के उत्तर में नंबर मिलने का समय रहा होगा तो आपने भी नहीं पढ़ा होगा)
मुहावरों का स्वयं में कोई अर्थ नहीं होता, अर्थात वे अपूर्ण वाक्य होते हैं, बहुधा उनमे क्रिया नहीं होती और जब तक वे वाक्य में प्रयुक्त न हों उनका कोई अर्थ नहीं होता. जैसे - अंधे की लाठी, आँख का तारा आदि-इत्यादि.
(अब जा के हमे समझ आया, ये मैडम की चाल थी हमसे वाक्य प्रयोग करवाने की, अगर नहीं करते तो पड़े रहते बेकार उनके मुहावरे)

वहीँ दूसरी ओर कहावतें या लोकोक्तियाँ अपने आप में पूर्ण वाक्य होते हैं और उनका पूर्ण अर्थ भी होता है. जैसे - न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी.
देखो सब तो कह दिया यहाँ. कुछ नहीं छोड़ा, नौ मन तेल लाओ राधा नचाओ, मुन्नी नचाओ, शीला नचाओ... बट प्लीज़ मैम ये तो बता दीजिये कौन सा आयल लाना है लाइक क्रूड-ऑयल, केरोसीन etc. like राधा को करना क्या था? खाना बनाना था? स्कूटी में डालना था? इन्फोर्मशन पूरी नहीं है. question rejected...

चलिए अब मुख्य मुद्दे पर आते हैं...आधुनिक मुहावरे और लोकोक्तियाँ. ये वो मुहावरे और लोकोक्तियाँ हैं जिनका या तो पाठ्य पुस्तकों में उल्लेख नहीं मिलता, या वे हिंदी भाषा के अन्य भाषाओँ से 'in a relationship' status नतीजा हैं.
लेकिन कालांतर में अब ये जन सामान्य के दैनिक भाष्य का अटूट अंग बन चुके हैं (गज़ब हिंदी लिख दिए हो त्रिवेदी जी, समझ आ रही है..?)

१. वाट लगाना:
२. लग लेना
३. ले लेना
४. झंड हो जाना
५. रायता फैलना
६. डंडा हो जाना
७. सेट्टिंग हो जाना
 ८. केला काटना
९. चिंटू बनाना
१० के.एल.पी.डी. हो जाना

अब आप का होमवर्क ये है की आप इनका अर्थ लिख कर वाक्य प्रयोग करें और हम नंबर देंगे ...