Wednesday, September 14, 2011

खबरों का इंतज़ार था, वो अब तक नहीं आयी

वाकिये तो यूँ शब भर होते किये तमाम,
खबरों का इंतज़ार था, वो अब तक नहीं आयी.

मसूद थे पर इस बात का इम्काँ  चलो टूटा,
इस बार वो बारिश हुई, घर तक चली आयी.

जुगनुओं की तलाश में भटका किये दिन भर,
आफताब की पहली किरन फिर दिन ढले आयी.

किताबें पढ़ने वालों से ख़ासी, नाखुश थी ज़िन्दगी,
फटे सफ़े के सवालों को वो पहलो पहल लाई.

मस्जिद की सब ईंटें चुकती गयीं वली,
मेरे आंगन में ये दीवार, बढ़ती चली आयी.


-- विद्रोही भिक्षुक

Friday, March 18, 2011

चार लाइन

सिर्फ चार लाइन हैं ...

चिराग़, मुझे नहीं पता क्या तेरी ख़ता है, 
पर जो भी रौशनी करता है उसे जला देते हैं ये लोग.

फकीर, तू किस तलाश में इस शहर में निकला है,
छत पे बैठे परिंदे भी उड़ा देते हैं ये लोग.

-- विद्रोही भिक्षुक

Tuesday, January 11, 2011

आधुनिक मुहावरे एवं लोकोक्तियाँ


स्कूल के दौरान इससे मज़ेदार और स्रजनात्मक लेखन प्रश्नोत्तरों के दौरान शायद ही किसी ने किसी ने किये हों. हमारी (इसे कुछ लोग मेरी भी कहते हैं, लेकिन हम लखनऊवासी 'मैं' को 'मैं' नहीं 'हम' कहते हैं क्योंकि हम कभी अकेले नहीं चलते, जहाँ चलते हैं चार लड़के दायें बाएँ हमेशा रहते हैं.) हिंदी की अध्यापिका महोदया हमेशा हमसे इसीलिए परेशान रहीं. कभी हम इस प्रश्न का उत्तर खाली छोड़ के नहीं आये. एक वाक्य बोलिन तौ दुई लिखेन की एक तौ सही हुइबे करिहै. एक बार तो उन्होंने हद्द ही कर दी. प्रश्न में सिर्फ वाक्य प्रयोग करने को बोला अर्थ लिखने को नहीं. हम बड़े खुश ... पढ़ लो ये रायता फैलाये थे हम.

सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाना:  मेरी सिट्टी-पिट्टी बहुत दिनों से गुम है, मिलती ही नहीं.
असमान फट पड़ना:         मेरा असमान बहुत दिनों से फटा पड़ा है. कृपया उसे जोड़ दें.

अब इस पर नंबर तो मिले नहीं. हाँ लेकिन सबके सामने बुला के वाह-वाही खूब मिली, और क्लास से तीन दिन की छुट्टी भी. खैर अब इतिहास के पन्नों से दूर निकल कर आज के वास्तविक मुद्दे पर आते हैं. आज का टॉपिक है - आधुनिक मुहावरे एवं लोकोक्तियाँ
वैसे इस टॉपिक पर अधिक प्रकाश डालने से पहले ये ज़रूरी है की मैं आप लोगों को मुहावरों और लोकोक्तियों (कहावतों) में अंतर बता दूं. (मुझे पूर्ण विश्वास है की जब इस प्रश्न के उत्तर में नंबर मिलने का समय रहा होगा तो आपने भी नहीं पढ़ा होगा)
मुहावरों का स्वयं में कोई अर्थ नहीं होता, अर्थात वे अपूर्ण वाक्य होते हैं, बहुधा उनमे क्रिया नहीं होती और जब तक वे वाक्य में प्रयुक्त न हों उनका कोई अर्थ नहीं होता. जैसे - अंधे की लाठी, आँख का तारा आदि-इत्यादि.
(अब जा के हमे समझ आया, ये मैडम की चाल थी हमसे वाक्य प्रयोग करवाने की, अगर नहीं करते तो पड़े रहते बेकार उनके मुहावरे)

वहीँ दूसरी ओर कहावतें या लोकोक्तियाँ अपने आप में पूर्ण वाक्य होते हैं और उनका पूर्ण अर्थ भी होता है. जैसे - न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी.
देखो सब तो कह दिया यहाँ. कुछ नहीं छोड़ा, नौ मन तेल लाओ राधा नचाओ, मुन्नी नचाओ, शीला नचाओ... बट प्लीज़ मैम ये तो बता दीजिये कौन सा आयल लाना है लाइक क्रूड-ऑयल, केरोसीन etc. like राधा को करना क्या था? खाना बनाना था? स्कूटी में डालना था? इन्फोर्मशन पूरी नहीं है. question rejected...

चलिए अब मुख्य मुद्दे पर आते हैं...आधुनिक मुहावरे और लोकोक्तियाँ. ये वो मुहावरे और लोकोक्तियाँ हैं जिनका या तो पाठ्य पुस्तकों में उल्लेख नहीं मिलता, या वे हिंदी भाषा के अन्य भाषाओँ से 'in a relationship' status नतीजा हैं.
लेकिन कालांतर में अब ये जन सामान्य के दैनिक भाष्य का अटूट अंग बन चुके हैं (गज़ब हिंदी लिख दिए हो त्रिवेदी जी, समझ आ रही है..?)

१. वाट लगाना:
२. लग लेना
३. ले लेना
४. झंड हो जाना
५. रायता फैलना
६. डंडा हो जाना
७. सेट्टिंग हो जाना
 ८. केला काटना
९. चिंटू बनाना
१० के.एल.पी.डी. हो जाना

अब आप का होमवर्क ये है की आप इनका अर्थ लिख कर वाक्य प्रयोग करें और हम नंबर देंगे ...

Wednesday, January 5, 2011

ज़हर की दुकान

ज़हर की दुकान पे जो भीड़ लगी देखी,
सोचा मैंने कौन हैं ये लोग अविवेकी,

अरे! एक, न ही दो, न ही तीन, न ही चार,
भीड़ थी कि भीड़ थी कि कई सौ हज़ार,

हर आदमी था खुश, करता था आगे पुश,
देख के इतना रश, मैं तो खा गया था गश.

मैंने पूछा "क्या सामूहिक आत्महत्या का है अरमान?"
या फिर देख के आये हो तुम लोग "तीस मार खान"?

वो बोले नहीं, आलू, प्याज, नमक के बाद अब ज़हर की है बारी.
क्योंकि मरने को मांगेगी जनता सारी.
कहीं न शुरू हो जाये इसकी भी कालाबाजारी,
इसलिए करते हैं एडवांस में खरीदारी.

Saturday, December 25, 2010

बीमार इस लाइलाज के फ़क़त एक हम नहीं.

निशानात पांवों के दो दर्ज हैं,
सहरा में अकेले हम ही हम नहीं.

हवाएं औसत से ज्याद गर्म हैं,
ये आहें हमारी अकेले नहीं.

बात तुम खूब कहते थे, कहते हो, कहते रहोगे,
चुप रहना यूँ हमारी भी फितरत नहीं.

न ओढ़न, न बालों, न पैरहन का सलीका,
सामाँ हमारे भी बिखरे कम नहीं.

ये छुप के रो लिए, वो मुंह धो के सो सो लिए,
पलकें हमारी भी कुछ कम नम नहीं.

हकीकत में ही जिला सकता तो तसवीरें बनाता क्यों खुदा,
खरीदार ख्वाबों के भी कुछ कम नहीं.

नज़्म लिखते हम हैं, पढ़ते तुम हो, बिकने दूर तक जाती हैं,
बीमार इस लाइलाज के फ़क़त एक हम नहीं.

Saturday, December 18, 2010

होने तक

किसी ने ज़ुल्फ़ को शाम कहा, किसी ने आँखों को समंदर,
मैं तुझको तुम ही लिख न सका, ये कलम फ़ना होने तक.

शिकायत चोर ने ज़ाहिर से की, सिपाही ने कोतवाल से,
वो मुझपे इलज़ाम ही लगाते रहे, फैसला होने तक.

शाम फिर दिन ढले ही आई, डाक-घर की बत्तियां भी जलीं,
मैं कुरेद कर ज़ख्म ही सुखाता रहा, सुबह होने तक.

जन्नत में सवाल बहुत हैं, दोज़ख में जगह कम है,
मुझे सलीब* पर ही रहने दो, आसरा होने तक.

Thursday, December 9, 2010

कच्ची कविता

समय का अभाव कहें या विचारों में लगी दीमक, लेकिन ग्रसित तो हूँ मैं इस समस्या से. अर्सा हुआ और कोई अपडेट भी नहीं आया. ऐसी शिकायतों से आजिज़ आ कर कुछ छापना पड़ रहा है. माल पुराना है, तकरीबन दस एक साल. लेकिन तब हमें "माल" लगता था. और ये ज़रूरी भी है, दो-चार विजिटर्स जो बचे हैं, उन्हें बचाने के लिए, और ये बताने के लिए कि - "त्रिवेदी मरा नहीं, त्रिवेदी मरते नहीं" :-)
कुछ एक चाहने वाले कोडर भाइयों का कथन है कि मुझे एक "तकनीकी - चिट्ठा" भी लिखना चाहिए. तो खैर काम चालू है, कच्छप गति से ही सही, पर है चालू. "त्रिवेदी रुका नहीं, त्रिवेदी रुकते नहीं" :-).
तब तक आनंद लें कच्ची कविता का, ठूंसे हुए अलंकारों का, और चालू तुकबंदी का. उम्मीद है नया साल कुछ नया लेकर आयेगा...

तुम ही मेरी कविता हो, इस निर्जल में सरिता हो,
तम हृदय जिसे सहेजा, उष्ण वही सविता हो,
तुम ही हो जिसके कम्पन पर, थिरकी थी यह लेखनी,
वे तेरे ही स्वर थे, फिरकी थी जिन पर रागिनी,
 उस शब्द-बाण के स्वामी तुम थे, जिसने भेदा था हृदय मेरा,
वह अलख निराली तेरी थी, तपता था जिसमें कुन्दन,
वह तुम ही थे जिसने अन्जाने में झंकृत किये तार तन
सप्तपर्णा, शीत-स्वर में वह तेरा आह्वान था,
मैं न जिसको समझ सका, उफ़! कितना अन्जान था,

कितना तुझमें दैन्य था, और कितना था आवेश,
मर्म न तेरा समझ सका, तुम बदले थे वेश,
यदि समक्ष आ गए होते, तुम चक्षु-चपल-चर-के-चल में,
छवि सहेज कर रखता तेरी, युग-युग तक अंतर्मन में.

कविता मेरी बुनी पड़ी, है हुई लेखनी जाम.
तुम दिखते हो मुझको अपलक एकटक अविराम.