दूरी कम , राह बड़ी, पर चल निकले हैं तय करने को,
इधर नदी है सूखी-सिमटी, उधर हमारी पड़ी नाव है.
बची रौशनी बुझी पड़ी है , सिगर रंग भी फीक चले हैं,
रुकते चलते, चलते रुकते जाना अपने बड़े गाँव है.
रात जमे कब, रब ही जाने, झींगुर कब गाने पाएंगे,
घिसट-घिसट कर दिन भर बीता, शाम की छत पर बड़ा घाम है.
तुम मंदिर में सुस्ता लेना, तुम मस्जिद में डेर जमाना,
मैं थोड़ा बगिया तक हो लूं, उधर हमारे बड़ी छाँव है.
तख्ती ले लो, हाथ गुदा लो, लो पर्ची पहचानों की,
हम जायेंगे हाथ हिलाते, वहां हमारा बड़ा नाम है.
.........................सुप्रेम त्रिवेदी
एक द्रवित हृदय और सजग मस्तिष्क की गुनगुनाहटें, आवाज़े, पुकारें, चिल्लाहटें और पीड़ाएँ.........
Monday, August 2, 2010
Monday, May 24, 2010
मेरे घर की टूटी खिड़की से
मेरे घर की टूटी खिड़की से, कुछ-कुछ धूप भी आती है कुछ-कुछ छाँव भी आती है.
अब तक वो शहरों में गुम थी, घने चार पहरों में गुम थी,
वो उजली सी, वो बिजली सी, सीमित वन में नहीं कदाचित,
मेरे गाँव भी आती है.
मेरे घर की टूटी खिड़की से, कुछ-कुछ धूप भी आती है कुछ-कुछ छाँव भी आती है.
हो मंगल का मेला, या जुमेरात की रात कव्वाली,
सीपी-शंख की मेलें छन-छन, झांझर-झुमके, बुर्के वाली.
क्रंदन कोलाहल बच्चों का, समझ सयानी शर्म की लाली.
चपल भागती कभी सरापट, झिझकी कभी, कभी कदाचित,
दबे पाँव भी आती है,
मेरे घर की टूटी खिड़की से, कुछ-कुछ धूप भी आती है कुछ-कुछ छाँव भी आती है.
गिरजाघर के घंटे टन-टन, जगराते की रात का मजमा,
भजन कीर्तन ढपली ढोलक, साखी सबद रमैनी अबतक,
कभी जगद-आरती जगदम्बा की, कभी अफ्तारी का घोष कदाचित, कभी
भोर अज़ान भी आती है.
मेरे घर की टूटी खिड़की से, कुछ-कुछ धूप भी आती है कुछ-कुछ छाँव भी आती है.
अब तक वो शहरों में गुम थी, घने चार पहरों में गुम थी,
वो उजली सी, वो बिजली सी, सीमित वन में नहीं कदाचित,
मेरे गाँव भी आती है.
मेरे घर की टूटी खिड़की से, कुछ-कुछ धूप भी आती है कुछ-कुछ छाँव भी आती है.
हो मंगल का मेला, या जुमेरात की रात कव्वाली,
सीपी-शंख की मेलें छन-छन, झांझर-झुमके, बुर्के वाली.
क्रंदन कोलाहल बच्चों का, समझ सयानी शर्म की लाली.
चपल भागती कभी सरापट, झिझकी कभी, कभी कदाचित,
दबे पाँव भी आती है,
मेरे घर की टूटी खिड़की से, कुछ-कुछ धूप भी आती है कुछ-कुछ छाँव भी आती है.
गिरजाघर के घंटे टन-टन, जगराते की रात का मजमा,
भजन कीर्तन ढपली ढोलक, साखी सबद रमैनी अबतक,
कभी जगद-आरती जगदम्बा की, कभी अफ्तारी का घोष कदाचित, कभी
भोर अज़ान भी आती है.
मेरे घर की टूटी खिड़की से, कुछ-कुछ धूप भी आती है कुछ-कुछ छाँव भी आती है.
Thursday, April 1, 2010
भरवाँ भिन्डी
मुझसे और मेरी लेखन शैली से परिचित लोगों को शायद ये विषय अटपटा सा लगे, या शायद ये भी हो सकता है कि कुछ लोग कुतूहलवश यह जानना चाहें कि कहीं मैं पाक-शास्त्र पर पारंगत होने ही तो यूं ही इतने समय से गायब नहीं रहा. न छिट्ठी, न पत्री, न तार, बेतार, न अता न पता और न ही विधिवत या स्फुट लेखन. और गाहे-बगाहे लौटा भी तो भिन्डी लेकर और वो भी भरवाँ....
वैसे मेरे जीवन चक्र कि गति इतनी वक्रीय, और कोणीय वेग इतना अनियत रहता है कि अभिकलन के तमाम सूत्र धत्ते से रह जाते हैं. खैर आत्म-लोकन मोड से मुद्दा मोड पर आते हैं. पिछली बार मैगी-वंदना से काफी देसी भावनाएं आहत हो गयी थीं और उनका कहना था कि ये सम्मान किसी स्वदेशी पकवान को मिलना चाहिए. अब स्वदेसी फास्ट फ़ूड तो होते नहीं और अधिकाधिक कुछ हुआ भी तो वो होगा डब्बाबंद तथाकथित करी(curry). तो पाक कला के क्षेत्र में स्वदेशी तरीके से की गयी हर हिमाकत को मैं पकवान कहता हूँ. अब पौने दो किलो तरकारी, डेढ़ मग बहते पानी में धुलकर, तिहत्तर मसाले डाल कर, और सवा दो तरीके से पका कर कोई फास्ट फ़ूड तो हरगिज़ न बनाएगा. वैसे इस सवा दो तरीके से पकाने के विषय में विद्वानों के कुछ मतभेद हैं और जिन बदनसीबों का हाथ पाक की महान कला में तंग है उनकी जानकारी के लिए यहाँ पर बताना अज़रूरी होगा कि पकाने कि भी रंगारंग विधियाँ हैं. जैसे कि भाप देना, उबलना, तलना, छौंकना, आंच देना और भून कर जला देना. इसमें से कर विधि का अपना रंग है जैसे कि भाप देने पर प्राकृतिक रंग कि प्रकृति नष्ट न होने पावे अथवा भून कर जलने पर जलायमान वस्तुएं अपनी अपनी प्रकृति को त्याग कर एकायमान, एकीकृत हो कर एक तत्त्व हो जाती हैं.
यहीं पर भिन्डी, माफ़ कीजियेगा भरवाँ भिन्डी बाकी पकवानों को मात देती नज़र आती है,
अव्वल तो ये की ये एक हरी सब्जी है और मम्मी त्रिवेदी का कहना है कि हरी सब्जी स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है.
इसे बनाने में तमाम मानवीय मूल्यों एवं विशेषणों का भरपूर परीक्षण होता है. जैसे कि अनुमानन की कला, धैर्य, साहस एवं अवसरवादिता और हाँ यदि भारी स्पेटुला अर्थात करछुल का उपयोग किया जाये तो ये कसरत के काम भी आती है.
भरवाँ भिन्डी के रस्ते का मुख्य पड़ाव है -उसका मसाला बनाना. इसके लिए तीन भाग धनिया पिसा, दो भाग हल्दी, दो भाग पिसी सौंफ, दो भाग अमचूर लें, उसमे नमक और मिर्च स्वादानुसार मिलाएं, और हाँ कलौंजी न भूल जायें. और हाँ इन्हें आपस में मिला कर इतना बारीक कर लें की आपके हाँथ दर्द होने लगें.
उपरोक्त तरीके से मसाले बनाने के कई फायदे हैं, सबसे बड़ा जो मुझे समझ आता है वो है इससे भारत में साक्षरता बढ़ेगी. क्योंकि इतना सामान बिना कागज़-कलम याद रखना तो संभव नहीं लगता. और आपके अनुमान, धैर्य और साहस का परीक्षण भी हो ही चुका है.
भरवाँ भिन्डी के लिए भिन्डी काटना भी एक कला है. ज़रा सा ऊँच नीच हुआ नहीं की बन गयी वो टुकड़ा भिन्डी. भिन्डी कट भी जाये और पता भी न चले. तब तो हुई बात-ए-तारीफ. यानि के टेस्ट हो गया आपकी सुश्पष्टता की कला(art of precision) का भी.
अब आती है बारी मसाला भरने की और इस कला का भरवाँ भिन्डी के क्षेत्र में वही महत्व है जो की उत्तर प्रदेश बोर्ड की परीक्षा में हैण्ड-राइटिंग का. मसाला बना चाहे जितना जानदार हो पर जब तक वो सही से, खूबसूरती से और सफाई से भरा न जाये, मास्टर-साहब नंबर नहीं देंगे.
और अंततः बारी आती है उसे तलने की. इसे धीमी - धीमी आंच पर देर तक सेकना चाहिए, जब तक भिन्डी का रंग भूरा न हो जाये और आपके माथे से पसीने की पहली बूँद न टपक जाये. भिन्डी पूरी तरह तैयार होने के पश्चात एक भीनी सी सुगंध छोडती है. (सौंफ के भूने जाने की) जिसे सूंघ कर आप तुरंत अपने लिविंग रूम से उठ कर रसोई में पहुँच जायें. मस्ती से भिन्डी खाएं.
और हाँ बर्तन मेरे लिए छोड़ दें , आखिर मुझे भी तो कुछ काम करना है.
इति सिद्धम - कि भरवाँ भिन्डी बनाने ,खाने एवं बर्तन धोने से आपका बहुमुखी विकास होता है.... धन्यवाद, जय हिंद , जय भारत..
वैसे मेरे जीवन चक्र कि गति इतनी वक्रीय, और कोणीय वेग इतना अनियत रहता है कि अभिकलन के तमाम सूत्र धत्ते से रह जाते हैं. खैर आत्म-लोकन मोड से मुद्दा मोड पर आते हैं. पिछली बार मैगी-वंदना से काफी देसी भावनाएं आहत हो गयी थीं और उनका कहना था कि ये सम्मान किसी स्वदेशी पकवान को मिलना चाहिए. अब स्वदेसी फास्ट फ़ूड तो होते नहीं और अधिकाधिक कुछ हुआ भी तो वो होगा डब्बाबंद तथाकथित करी(curry). तो पाक कला के क्षेत्र में स्वदेशी तरीके से की गयी हर हिमाकत को मैं पकवान कहता हूँ. अब पौने दो किलो तरकारी, डेढ़ मग बहते पानी में धुलकर, तिहत्तर मसाले डाल कर, और सवा दो तरीके से पका कर कोई फास्ट फ़ूड तो हरगिज़ न बनाएगा. वैसे इस सवा दो तरीके से पकाने के विषय में विद्वानों के कुछ मतभेद हैं और जिन बदनसीबों का हाथ पाक की महान कला में तंग है उनकी जानकारी के लिए यहाँ पर बताना अज़रूरी होगा कि पकाने कि भी रंगारंग विधियाँ हैं. जैसे कि भाप देना, उबलना, तलना, छौंकना, आंच देना और भून कर जला देना. इसमें से कर विधि का अपना रंग है जैसे कि भाप देने पर प्राकृतिक रंग कि प्रकृति नष्ट न होने पावे अथवा भून कर जलने पर जलायमान वस्तुएं अपनी अपनी प्रकृति को त्याग कर एकायमान, एकीकृत हो कर एक तत्त्व हो जाती हैं.
यहीं पर भिन्डी, माफ़ कीजियेगा भरवाँ भिन्डी बाकी पकवानों को मात देती नज़र आती है,
अव्वल तो ये की ये एक हरी सब्जी है और मम्मी त्रिवेदी का कहना है कि हरी सब्जी स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है.
इसे बनाने में तमाम मानवीय मूल्यों एवं विशेषणों का भरपूर परीक्षण होता है. जैसे कि अनुमानन की कला, धैर्य, साहस एवं अवसरवादिता और हाँ यदि भारी स्पेटुला अर्थात करछुल का उपयोग किया जाये तो ये कसरत के काम भी आती है.
भरवाँ भिन्डी के रस्ते का मुख्य पड़ाव है -उसका मसाला बनाना. इसके लिए तीन भाग धनिया पिसा, दो भाग हल्दी, दो भाग पिसी सौंफ, दो भाग अमचूर लें, उसमे नमक और मिर्च स्वादानुसार मिलाएं, और हाँ कलौंजी न भूल जायें. और हाँ इन्हें आपस में मिला कर इतना बारीक कर लें की आपके हाँथ दर्द होने लगें.
उपरोक्त तरीके से मसाले बनाने के कई फायदे हैं, सबसे बड़ा जो मुझे समझ आता है वो है इससे भारत में साक्षरता बढ़ेगी. क्योंकि इतना सामान बिना कागज़-कलम याद रखना तो संभव नहीं लगता. और आपके अनुमान, धैर्य और साहस का परीक्षण भी हो ही चुका है.
भरवाँ भिन्डी के लिए भिन्डी काटना भी एक कला है. ज़रा सा ऊँच नीच हुआ नहीं की बन गयी वो टुकड़ा भिन्डी. भिन्डी कट भी जाये और पता भी न चले. तब तो हुई बात-ए-तारीफ. यानि के टेस्ट हो गया आपकी सुश्पष्टता की कला(art of precision) का भी.
अब आती है बारी मसाला भरने की और इस कला का भरवाँ भिन्डी के क्षेत्र में वही महत्व है जो की उत्तर प्रदेश बोर्ड की परीक्षा में हैण्ड-राइटिंग का. मसाला बना चाहे जितना जानदार हो पर जब तक वो सही से, खूबसूरती से और सफाई से भरा न जाये, मास्टर-साहब नंबर नहीं देंगे.
और अंततः बारी आती है उसे तलने की. इसे धीमी - धीमी आंच पर देर तक सेकना चाहिए, जब तक भिन्डी का रंग भूरा न हो जाये और आपके माथे से पसीने की पहली बूँद न टपक जाये. भिन्डी पूरी तरह तैयार होने के पश्चात एक भीनी सी सुगंध छोडती है. (सौंफ के भूने जाने की) जिसे सूंघ कर आप तुरंत अपने लिविंग रूम से उठ कर रसोई में पहुँच जायें. मस्ती से भिन्डी खाएं.
और हाँ बर्तन मेरे लिए छोड़ दें , आखिर मुझे भी तो कुछ काम करना है.
इति सिद्धम - कि भरवाँ भिन्डी बनाने ,खाने एवं बर्तन धोने से आपका बहुमुखी विकास होता है.... धन्यवाद, जय हिंद , जय भारत..
Friday, January 1, 2010
नए साल में
उधर सुना था कोई,
मांग रहा था नयी सुबह नए साल में, उज्ज्वल धरती,
अप्रदूषित जल, गुनगुनी धुप और खुशहाल चहरे.
बे-इमान रहा होगा,
या फिर बीमार. बीमारी भी ऐसी लाईलाज जो दोहराती है हर साल,
लौट आती है हर बार
इसी दिन.
गजब बीमारी, बीमारियों में बीमारी, बीमारी उम्मीद की.
पार साल मैंने तो इलाज करवा लिया था.
महंगा था, मुश्किल भी.
पर बीमारी भी तो फंनेखां कम कहाँ थी.
अब कहाँ आते हैं मुझे सपने, खुशहाली के, रौशनी के, धूप और चांदनी के.
और अनजान खून देख के कुछ महसूस भी कहाँ करता हूँ मैं.
जैसे उस दिन के ढाई सौ, जब मैं सिनेमा देख रहा था.
या उस दिन के सौ, जब मैं बॉस से प्रमोशन की बात कर रहा था.
या उस दिन के तिरसठ, जब तेरी गोद मैं चाँद सितारों से भर रहा था.
या उस देर रात की पार्टी वाले सात.
लेकिन फिर भी,
खुदा ज़रा मौतें कम कर दे नए साल में
इस साल टीवी में कुछ नया देखने का मन है बस.
..................................सुप्रेम
मांग रहा था नयी सुबह नए साल में, उज्ज्वल धरती,
अप्रदूषित जल, गुनगुनी धुप और खुशहाल चहरे.
बे-इमान रहा होगा,
या फिर बीमार. बीमारी भी ऐसी लाईलाज जो दोहराती है हर साल,
लौट आती है हर बार
इसी दिन.
गजब बीमारी, बीमारियों में बीमारी, बीमारी उम्मीद की.
पार साल मैंने तो इलाज करवा लिया था.
महंगा था, मुश्किल भी.
पर बीमारी भी तो फंनेखां कम कहाँ थी.
अब कहाँ आते हैं मुझे सपने, खुशहाली के, रौशनी के, धूप और चांदनी के.
और अनजान खून देख के कुछ महसूस भी कहाँ करता हूँ मैं.
जैसे उस दिन के ढाई सौ, जब मैं सिनेमा देख रहा था.
या उस दिन के सौ, जब मैं बॉस से प्रमोशन की बात कर रहा था.
या उस दिन के तिरसठ, जब तेरी गोद मैं चाँद सितारों से भर रहा था.
या उस देर रात की पार्टी वाले सात.
लेकिन फिर भी,
खुदा ज़रा मौतें कम कर दे नए साल में
इस साल टीवी में कुछ नया देखने का मन है बस.
..................................सुप्रेम
Sunday, September 13, 2009
चूरन वाले बाबा
चूरन वाले बाबा
शायद आखिरी बार मैंने उन्हें तब देखा था जब मैं कक्षा छः में था. उम्र शायद उनकी रही होगी साठ से पैंसठ के बीच पर जिन्दगी, दुपहरी, धुंए और बीमारी ने जी तोड़ कोशिश की थी की वो पचहत्तर-अस्सी से कम के न दिखें. एक छोटी से संदूकची, जिसमे ताला लगाने की कोई ज़रुरत न थी, ताले की कुंडी और उसके आसपास का इलाका जंग ने वैसे ही गला दिया था जैसे जिन्दगी ने उनके शरीर को, उसे वो अपने सर पर रखकर अक्सर छुट्टी के समय आते दिखते थे.
वैसे उस ज़माने में भी सोफिस्टीकेशन की बयार चल सी निकली थी. पारंपरिक स्कूली ठेलों की, जहाँ पहले कमरख, कैथा, जामुन और लैय्या-चना मिलता था. वहां पैक्ड-फ्रूट और क्वालिटी की रेफ्रिजेरेशन-यूनिट्स खड़ी मिलने लगना शुरू हो चुकी थी.
शायद इसी से चूरन वाले बाबा अनभिज्ञ थे, की अब वो बच्चों के लाडले नहीं रहे और उनका ज़माना उनकी उम्र की ही तरह ढल गया है. मैं शायद तब तक समझदार हो चुका था. इतना कि खुली और सूखी आँखों में विभेद कर सकूं. मैं हमेशा उनसे चूरन खरीदता था. हालाँकि मुझे चूरन पसंद न था. न ही उनकी खट्टी-मीठी गोलियां. लें उसे खरीदने के बाद सो संतुष्टि मुझे मिलती थी और वो उनके आँखों की चमक मुझे बड़ी अच्छी लगती थी. एक रुपये में चार पुडियाँ खट्टा-मीठा काला-लाल गोलियां और मीठी सौंफ. न जाने कितना ही सामान बेच जाते थे वो एक रुपये में... और हर रोज़ ही मुझे लगता था की कल वो आएंगे या नहीं...
खैर
वो दिन तो बीती हुई बातें हैं, वो स्कूल वो छुट्टी वो घंटियाँ ... वो रास्ते ... सब कुछ ... पर कहीं कुछ रह सा गया है...क्या हुआ उन चूरन वाले बाबा का ... कहीं एक उडती उडती बात भी सुनी थी की उनके अमीनाबाद में कई मकान हैं...और उनके लड़के बच्चों ने ही की थी उनकी ये दुर्गति ... मैं सोचता था बड़ा होगे उनके बच्चों से उन्हें इन्साफ दिलाऊँगा .. खैर मर गया वो मुंसिफ भी और वो इन्साफ का मसीहा भी ... दुनिया की इस रेलमपेल में ... खैर बाबा मुआफ करना ....
शायद आखिरी बार मैंने उन्हें तब देखा था जब मैं कक्षा छः में था. उम्र शायद उनकी रही होगी साठ से पैंसठ के बीच पर जिन्दगी, दुपहरी, धुंए और बीमारी ने जी तोड़ कोशिश की थी की वो पचहत्तर-अस्सी से कम के न दिखें. एक छोटी से संदूकची, जिसमे ताला लगाने की कोई ज़रुरत न थी, ताले की कुंडी और उसके आसपास का इलाका जंग ने वैसे ही गला दिया था जैसे जिन्दगी ने उनके शरीर को, उसे वो अपने सर पर रखकर अक्सर छुट्टी के समय आते दिखते थे.
वैसे उस ज़माने में भी सोफिस्टीकेशन की बयार चल सी निकली थी. पारंपरिक स्कूली ठेलों की, जहाँ पहले कमरख, कैथा, जामुन और लैय्या-चना मिलता था. वहां पैक्ड-फ्रूट और क्वालिटी की रेफ्रिजेरेशन-यूनिट्स खड़ी मिलने लगना शुरू हो चुकी थी.
शायद इसी से चूरन वाले बाबा अनभिज्ञ थे, की अब वो बच्चों के लाडले नहीं रहे और उनका ज़माना उनकी उम्र की ही तरह ढल गया है. मैं शायद तब तक समझदार हो चुका था. इतना कि खुली और सूखी आँखों में विभेद कर सकूं. मैं हमेशा उनसे चूरन खरीदता था. हालाँकि मुझे चूरन पसंद न था. न ही उनकी खट्टी-मीठी गोलियां. लें उसे खरीदने के बाद सो संतुष्टि मुझे मिलती थी और वो उनके आँखों की चमक मुझे बड़ी अच्छी लगती थी. एक रुपये में चार पुडियाँ खट्टा-मीठा काला-लाल गोलियां और मीठी सौंफ. न जाने कितना ही सामान बेच जाते थे वो एक रुपये में... और हर रोज़ ही मुझे लगता था की कल वो आएंगे या नहीं...
खैर
वो दिन तो बीती हुई बातें हैं, वो स्कूल वो छुट्टी वो घंटियाँ ... वो रास्ते ... सब कुछ ... पर कहीं कुछ रह सा गया है...क्या हुआ उन चूरन वाले बाबा का ... कहीं एक उडती उडती बात भी सुनी थी की उनके अमीनाबाद में कई मकान हैं...और उनके लड़के बच्चों ने ही की थी उनकी ये दुर्गति ... मैं सोचता था बड़ा होगे उनके बच्चों से उन्हें इन्साफ दिलाऊँगा .. खैर मर गया वो मुंसिफ भी और वो इन्साफ का मसीहा भी ... दुनिया की इस रेलमपेल में ... खैर बाबा मुआफ करना ....
Sunday, July 19, 2009
मुझ पर जितने वार करोगे, मैं मरकर हर बार लिखूंगा.
रचयिता को विषयों का आभाव तो चिर काल से रहा है. और जिस गति से हम विषयों को खा रहे हैं, लाजमी हैं की कवि विद्रोही हो जाये. अरे तुमने उसकी नदी को मार दिया, उसके फूलों से हंसी छीन कर उन्हें एक भूखा पापी पेट दे दिया, और भूख मिटने को दे दीं लोहे की खून से सनी गोलियां. उसकी ज़मीन पर तो कहीं रेखा नहीं खिँची थी....तो मजबूरी में उसे ये लिखना पड़ रहा है.. आनंद लें पर सिर्फ आनंद न लें...खैर बड़े दिनों बाद कुछ निकला है क्या कहते हैं अंग्रेजी में उसे straight from the heart. इस पर मुझे प्रतिक्रियाओं का लालच अवश्य है...तो इंतज़ार रहेगा प्रतिक्रियाओं का.....
अगर यूँ ही कुछ लिखने को न मिला तो क्या ये कलम दम तोड़ देगी,
मैं शायर हूँ, कहीं-कहीं से, कुछ ढूंढ-ढूंढ कर लाऊँगा,
चिलमन कोई जला दूंगा, बीडी कोई बुझाऊँगा,
कुछ सिमटी रातें तह करके, रख दूंगा अलमारी में
सारी बारिश सुखा-सुखा कर, सागर तुझे डुबा दूंगा.
बंद करूंगा सूरज तुझको सात कड़ी के तालों में,
चाँद तुम्हारे रेशे ले कर खद्दर नयी बनाऊंगा.
प्रेम लिखूंगा वार लिखूंगा, अर्दप अत्याचार लिखूंगा,
फूलों से खुशबू ले लूँगा, काँटों पर बलिहार लिखूंगा.
खंडहरों में जमा के महफिल, शीश महल-यलगार लिखूंगा.
लैला से शोखी ले लूँगा, मजनू को व्यापार लिखूंगा.
चारू-चन्द्र की तिरपन किरणे, छीन भरूँगा डिबिया में.
सरहद को बंदी कर दूंगा, फिर उस पर उस पार लिखूंगा.
घर चौबारे एक करूंगा, को सूरज मद्धम कर दूंगा,
जहाँ-जहाँ पर भीड़ लगेगी, सबको निर्जन थार लिखूंगा.
तरुवर को फलहीन करूंगा, सरवर होंगे रक्त-पिपासु,
दो तलवारें एक म्यान में, एक नहीं सौ बार लिखूंगा.
एक अकेली मछली, सब तालाबों को साफ करेगी,
निरीह चने को साथ बिठाकर, फूटे सारे भाड़ लिखूंगा.
राजा के जालिम प्रहरी को, जीवन-मित्र बना दूंगा,
ओ लटके फाँसी के फंदे, तुझको विजयी हार लिखूंगा.
मृत्यु को जीवन गीत बताकर, घुल कर हवा में बह जाऊँगा,
मुझ पर जितने वार करोगे, मैं मरकर हर बार लिखूंगा.
..........................................................सुप्रेम त्रिवेदी "आबाद" उर्फ़ "बर्बाद"
अगर यूँ ही कुछ लिखने को न मिला तो क्या ये कलम दम तोड़ देगी,
मैं शायर हूँ, कहीं-कहीं से, कुछ ढूंढ-ढूंढ कर लाऊँगा,
चिलमन कोई जला दूंगा, बीडी कोई बुझाऊँगा,
कुछ सिमटी रातें तह करके, रख दूंगा अलमारी में
सारी बारिश सुखा-सुखा कर, सागर तुझे डुबा दूंगा.
बंद करूंगा सूरज तुझको सात कड़ी के तालों में,
चाँद तुम्हारे रेशे ले कर खद्दर नयी बनाऊंगा.
प्रेम लिखूंगा वार लिखूंगा, अर्दप अत्याचार लिखूंगा,
फूलों से खुशबू ले लूँगा, काँटों पर बलिहार लिखूंगा.
खंडहरों में जमा के महफिल, शीश महल-यलगार लिखूंगा.
लैला से शोखी ले लूँगा, मजनू को व्यापार लिखूंगा.
चारू-चन्द्र की तिरपन किरणे, छीन भरूँगा डिबिया में.
सरहद को बंदी कर दूंगा, फिर उस पर उस पार लिखूंगा.
घर चौबारे एक करूंगा, को सूरज मद्धम कर दूंगा,
जहाँ-जहाँ पर भीड़ लगेगी, सबको निर्जन थार लिखूंगा.
तरुवर को फलहीन करूंगा, सरवर होंगे रक्त-पिपासु,
दो तलवारें एक म्यान में, एक नहीं सौ बार लिखूंगा.
एक अकेली मछली, सब तालाबों को साफ करेगी,
निरीह चने को साथ बिठाकर, फूटे सारे भाड़ लिखूंगा.
राजा के जालिम प्रहरी को, जीवन-मित्र बना दूंगा,
ओ लटके फाँसी के फंदे, तुझको विजयी हार लिखूंगा.
मृत्यु को जीवन गीत बताकर, घुल कर हवा में बह जाऊँगा,
मुझ पर जितने वार करोगे, मैं मरकर हर बार लिखूंगा.
..........................................................सुप्रेम त्रिवेदी "आबाद" उर्फ़ "बर्बाद"
Wednesday, July 15, 2009
फिर रो-रो के दुपट्टे को भिगोता क्यूँ है.
मैं तो आखिरी ख़त भी वहीं छोड़ आया था,
फिर ये कत्ल का इल्जाम मुझ पे लगा क्यूँ है.
आवाजें तो दफ्न हो गईं थी सब उस दिन,
गली के आखिर में फिर ये शराबा क्यूँ है.
सो गयी रात, ताउम्र, सुन कर वो आखिरी हरफ,
बेशर्म चाँद आज फिर निकला क्यूँ है.
दुहाई को रिश्तों की कीमत अदा तो कर दी थी पूरी,
सारा शहर फिर तिजारत पे निकला क्यूँ है.
वो कहता है की बाकी नहीं है याद कोई सीने में,
फिर रो-रो के दुपट्टे को भिगोता क्यूँ है.
.....................................................suprem trivedi "aabaad"
फिर ये कत्ल का इल्जाम मुझ पे लगा क्यूँ है.
आवाजें तो दफ्न हो गईं थी सब उस दिन,
गली के आखिर में फिर ये शराबा क्यूँ है.
सो गयी रात, ताउम्र, सुन कर वो आखिरी हरफ,
बेशर्म चाँद आज फिर निकला क्यूँ है.
दुहाई को रिश्तों की कीमत अदा तो कर दी थी पूरी,
सारा शहर फिर तिजारत पे निकला क्यूँ है.
वो कहता है की बाकी नहीं है याद कोई सीने में,
फिर रो-रो के दुपट्टे को भिगोता क्यूँ है.
.....................................................suprem trivedi "aabaad"
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