Thursday, January 22, 2009

और मेरी आवाज़ दबी है.

आंसू झर-झर बह निकले हैं,
सन्नाटों में साँस रुकी है,
गला रुन्ध्र है लहू झलकता
और मेरी आवाज़ दबी है

अंजानो के इस जंगल में
सारे साथी रात सो गए
मुट्ठी भींची, शक्ति समेटी
तब तक मेरे हाथ खो गए
दीपक दिखता नखत चमकता
सन्नाटों में साँस रुकी है
गला रुन्ध्र है लहू झलकता
और मेरी आवाज़ दबी है.

सुन सकते हो सुनते जाओ
रुक सकते हो रुकते जाओ
हाथ बढ़ाता हाथ न आता
मैं कुछ चलता कुछ रुक जाता
कहने सुनने के झंझट में
जो कहनी थी बात रुकी है
गला रुन्ध्र है लहू झलकता
और मेरी आवाज़ दबी है.

Sunday, January 11, 2009

आज रात मैं नींद से जागा...

कुछ भूल सा गया हूँ या .. अगर सही से याद हो किसी को या २००४ की 'सृजन' हो किसी के पास तो इसे सही करने में मदद करें

आज रात मैं नींद से जागा, भाग्य उदय कर उठा अभागा.
कल का दिन कुछ याद नहीं है, खोया-पाया ज्ञात नहीं है.
धड़कन दिल से दूर गयी थी, स्मृति मुझको भूल रही थी.
शरण मुझे रणभूमि ने दी थी, गोला उस गुल-आब ने दागा.
आज रात मैं नींद से जागा....

सपने मेरे टूट चुके थे, अपने मेरे रूठ चुके थे,
जीवन झूला झूल रहा था, अपने पथ को भूल रहा था,
अर्घ्य मेरा स्वीकार हुआ ना, ख़ुद पर भी अधिकार हुआ ना.
गाड़ी मेरी छूट रही थी, कोशिश कर पुरज़ोर मैं भागा.
आज रात मैं नींद से जागा....

गुलशन तपती रेत हो गए, पुष्प काल की भेंट हो गए,
चक्रवात ही चक्रवात थे, बांधे मुझको मोहपाश थे.
सब थे मिलकर नाच नचाते, नए नए थे खेल रचाते.
फ़िर टूटा कठपुतली धागा,आज रात मैं नींद से जागा...

जाग गया हूँ सोऊंगा न, प्राप्त किया खोऊंगा न ,
तरकश का निर्माण करूंगा, अब उसमे हर बाण रखूंगा,
हाँ मैंने हर आंसू त्यागा, आज रात मैं नींद से जागा.
....................... सुप्रेम त्रिवेदी "आबाद"

Sunday, December 21, 2008

ये शायर की ज़बानी है, लहू से रंग लाती है.

तो क्या कर रात है काफी, अँधेरा जीतने वाला,
हमारे घर के आँगन में अभी भी धूप आती है.

उधर जल्लाद बैठे हैं, ये बस्ती दोज़खों की है,
हमारे आंसुओं से घंटियों की गूँज आती है.

कोहरा है घना और सर्दियाँ जमा देने ही वाली हैं,
ये अपनी आहें हैं जो गर्मियां बन खूब आती हैं.

चढा देना वो सूली पर या सीना चाक कर देना,
ये शायर की ज़बानी है, लहू से रंग लाती है.

...................................... सुप्रेम त्रिवेदी "आबाद" 01:46 GMT

Saturday, December 13, 2008

.....

ये कविता मैंने काफी पहले लिखी थी तकरीबन आठ एक साल पहले शायद फरवरी २००० mein. तो भाषा में बचकानापन हो सकता है. हो सकता है ये तथाकथित काव्यगत मानको पर खरी भी न उतरे. लेकिन विचार और विद्रोह में कहीं से कम नहीं है. aur Reference to the context इससे बेहतर सच कहूं तो लिख ही नहीं पाया. शायद आग बुझ गयी है या विद्रोह पीडा में बदल गया है. लेकिन एक बात है ज़िंदगी बड़ी है और दुनिया गोल. So friends it is not over till its over. पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त...Till then enjoy the raw thoughts..
कभी देखता हूँ दिन के उजाले में, अन्दर नाक़ाब ए काले में,ज़माने को दिया जलना सिखाते हैं, अपने घर में कालिख बनाते हैं,
दो मीठे बोल को तरसे हम, उगलेंगे सब ही ज़हर खरा,थोड़ी सी मिल जाये छूट, खा जायें नोच कर कटा मरा,
अंधेरो के खेत सींचते, बन्दूंको से ख्वाब उगाते,आग बुझाने का धंधा करते, अन्दर जिनके तेजाब भरा,
हर घर की छत पर आग लगी, चिमनी से नज़रदराज़ धुंआ.खाते थे पका कर रोटी जहाँ, खोदा है वहां लाशों का कुआँ.
.....................सुप्रेम त्रिवेदी "आबाद"

Wednesday, November 19, 2008

पता नहीं क्यों?

पता नहीं क्यों?
ये कहानी है और इसे कहानी की तरह पढ़ें. न तो मैं बदकिस्मत हूँ और न ही किसी बदकिस्मत को जानता हूँ. इसके सभी पात्र और घटनाएं काल्पनिक हैं. यदि मेरे परिचितों में से किसी को ये कहानी उसकी या मेरी ज़िंदगी से प्रेरित लगती है तो ये मात्र एक विडम्बना है और उसकी बदकिस्मती. ज्ञानी लोग ऐसी बदकिस्मतियों को इत्तेफाक भी कहते हैं.........

कभी कभी मुझे लगता है पता नहीं क्यों मैं सिर्फ़ हारने के लिए बना हूँ? मतलब भला बताइए दोष आख़िर दें तो किसे दें? भगवान को कोसें कि किस्मत को भला-बुरा कहें या फ़िर दोष मढ़ दें अपने आस-पड़ोस, यार-दोस्त, प्रिय-प्रियदि आदि-इत्यादि पर.

कभी-कभी मेरे दिल मैं ख़याल आता है कि कोई इतना बदकिस्मत हो भी कैसे सकता है मतलब कोई upper limit नाम की भी चीज़ होती है. लगता है भगवान ने मेरा ये वाला counter infinite सेट कर दिया है. बेटा लगाये रहो लूप पर लूप फेल नहीं होने का. निश्चित ही भगवान ने जिस coder को मेरी किस्मत लिखने का contract दिया होगा उसकी उस दिन की बिलिंग नहीं हुई होगी. या फ़िर ये कोई inherent legacy bug था लो टेस्टिंग तो सारी पास कर गया पर प्रोडक्शन में आकर फ़ेल हो गया और बदकिस्मती से वो प्रोडक्शन-environment मेरी ज़िंदगी है.


इंतिहा ये है की अगर मैं दौड़ में दौड़ भी न रहा हूँ तो भी हार जाता हूँ. क्यों गया देखने साले ले भुगत?मतलब खेल रहें हैं फ्रांस-जर्मनी, मैच हो रहा है हजारों मील दूर, हारता कौन है मैं? ले बे और देख टी.वी?

कुछ लोग अपने पाँव पर कुल्हाडी मारते हैं, कुछ महान लोग कुल्हाडी पर पाँव मार लेते हैं. मैं भैय्या क्या करता हूँ सुनो. पहिले मैं अपने पाँव पर लगा सेफ्टी कवर काटता हूँ. फ़िर लकडी ढूंढता हूँ. कहीं नहीं मिलती तो जंगल जाता हूँ सर फुटा, के हाँथ टुटा के वहां से लकडी लाता हूँ लोहे का जुगाड़ करता हूँ. धौंकनी पर बैठ कर लोहारमय हो कर दिन रात एक कर के एक कुल्हाडी बनाता हूँ फ़िर बड़े प्रेम से धीमे-धीमे अपना पाँव काटता हूँ की बेटा पाँव तो कटे ही कटे पर नासूर भी बने.


मतलब बताइए की ये कहाँ का न्याय है? स्कूल से लेकर कोलेज तक, घर से लेकर मोहल्ले तक नौकरी से ले कर छोकरी तक जब कुछ बुरा होना होता है पता नहीं कैसे मैं उसे ढूंढ लेता हूँ.


मेरे पिताजी की मोटर-साईकिल, चम्-चमनुआ झकास एक दम बारह साल से फटाफट दौड़ती थी. छींक तक नहीं आयी उसे कभी, या कभी तेल तक ज्यादा पिया हो. लेकिन उसे ख़राब होना था .. और मौत भी लिखी थी उसकी उसकी उस दिन जिस दिन हमारा जे.ई.ई. मेंस का पेपर था. कभी नहीं बैठे हम उस मोटर-साईकिल पे. लेकिन पता नहीं क्या सूझी उस दिन "मम्मी आज ये ले जाता हूँ. पापा की बाइक लक्की है!!" ले बेटा लक!!

कृमशः..

Sunday, October 26, 2008

कहाँ होगी

इस समंदर में तो सूखी नदियाँ ही मिलेंगी,
बर्फ उन पहाड़ों पर पिघली कहाँ होगी।

कल फूल मुरझाये थे, आज काँटे भी झड़ गये,
खुदा जाने वो आख़िरी तितली कहाँ होगी।

पेट की आग ने हर चिंगारी को बुझा देना था,
फिर चीख इंकलाब की निकली कहाँ होगी।

अब बटेर चुक गये हैं, पर इंसान बहुत हैं,
फिर शिकारियों ने अपनी आदत बदली कहाँ होगी।

हमेशा से इसने घर, दुकाँ और खेत ही जलाए हैं,
गिरे जो ज़ालिमों पर वो बिजली कहाँ होगी।

कलम को ताक़तवर बताना, हर खूँखार की साज़िश थी,
वो अम्नपसंद थी, म्याँ से निकली कहाँ होगी।

आज रात भी भूखे आमिर की अप्पी घर नहीं लौटी,
मुझे मालूम है वो मासूम फिसली कहाँ होगी।

..........................................सुप्रेम त्रिवेदी "बर्बाद"

Tuesday, July 1, 2008

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बहुत दिनों से या सच कहूं तो बहुत सालों से ये प्रोजेक्ट(सॉफ्टवेयर इंजीनियर हर काम को प्रोजेक्ट कहते हैं, यहाँ तक कि सुबह उठ कर नित्य कर्म करने को भी वे प्रोजेक्ट कहते हैं) मेरे मन-मस्तिष्क में कूद फांद कर रहा था. चेतन भगत भ्राता के पश्चात तो बाढ़ सी आ गयी. कोई कुछ भी लिख देता और समझता कि लो बाऊजी बन गयी एक और बेस्टसेलर. बस लेखक के नाम् के आगे इंजीनियर और ऍम.बी.ऐ लगा दो और धडाधड कलेक्ट करो रोयल्टी. तो मैंने भी ठान ली कि सर जी लिखना तो अपने को भी है.
तो जी बात कि शुरुआत कहाँ से हुई, कहाँ से खोज हुई कि ये जो 'सॉफ्टवेयर इंजीनियर' है ये भिन्न प्रजाति का प्राणी है. कब ये मनुष्य योनी से किसी और योनी में प्रवेश कर गया. इतिहास पुराना नहीं पर गूढ़ और रहस्यमय ज़रूर है. ये शायद कोई नहीं जानता कि इस प्रजाति का उद्भव कैसे हुआ पर इतना ज़रूर ज्ञात हुआ है कि इनके पूर्वज पूर्णतया मनुष्य थे. फ़िर कालांतर में उनके जींस और आचार व्यवहार में ऐसे बदलाव आए कि 'म्यूटेशन(Mutation) ' नामक शब्द भी छोटा पड़ गया......